#Poem : किस उलझन में उलझे हो?

कल कहीं एक बचपन देखायूंही गलियों में भटकता था।आंखे सूनी थी उसकीकिसी की झुठन को तरसता था।एक बुड़ापा भी देखासड़क किनारे बस्ता था।रुपया, दो रुपया मिल जाएठोकरों के जूते साफ करता था।सुना एक प्यास के बारे मेंमीलों पानी के लिए भटकती है।सुना एक जवानी के बारे मेंरोज़गार के लिए तरसती Read More …